सवाल और समझ – मनोज पीलौड़ी

देश आज़ाद हुआ, हम आज तक चर्चा करते है संविधान सभा की बहसों और प्रकरणों पर, कि क्या सही है और क्या ग़लत है।
देश की आज़ादी के बाद सम्पूर्ण क्रान्ति का नारा लगा। उसका सही- ग़लत पर हम आज भी चर्चा करते है। मंडल आयोग आने के समय देश में हुए राजनैतिक परिवर्तन पर हम आज सही ग़लत चर्चा करते है। सारे समाजवादी निबंधकार रात दिन लगे रहते है।
कोई भी आंदोलन पूर्णत सही शायद ही रहा हो, यहाँ तक की आज़ादी पर भी लोग सवाल करते है, करना भी चाहिए।पेरियार आज़ादी पर बड़ा सवाल किए । “15 अगस्त 1947 को पूरा भारत और पूरा विश्व भारत की आज़ादी का जश्न मना रहा था तब पेरियार ने अपनी अंतदृष्टि से एक साहसिक घोषणा करते हुए कहा था कि यह तमिलों के लिए शोक का दिन है ।उन्होनें कहा कि भारत की आज़ादी कुछ और नही बस सत्ता हस्तांतरण है।”
पेरियार के प्रतिनिधि विचार – प्रमोद रजंन की किताब से।
जो आंदोलन जिस समय हो रहा होता हैं उसे बहुत ठोक-पीट के आगे बढ़ाना चाहिए। मंडल आयोग ,सम्पूर्ण क्रांति के समय भी ऐसे लोग रहे है जिन्होंने इस सारे मूवमेंन्ट को और सही दिशा देने के लिए तार्किक सवाल अपने लोगों से किए, जो मूवमेंट को लीड कर रहे है उनसे। उन लोगों को जो बस जयकारे लगाते है,उन्होंने सवाल करने वाले लोगों को ज़ाहिर है आंदोलन कमजोर करने वाला या ग़लत दिशा देने वाला ( आपसी जलन वाला बताया होगा ) बताया होगा। आज सवाल करने वाले लोग सही थे ये पता चलता है, और उनकी महत्ता पता चलती है। पता चलता उनके सवालों को अगर जगह मिलती तो आंदोलन के परिणाम और सार्थक होते। इन आंदोलनों पर समाजवादी लोग आज भी भारी संख्या मे लिखते है। समाजवादी लोग शहीद जगदेव प्रसाद, रामस्वरूप वर्मा,चन्द्रशेखर ,से लेकर तमाम ऐसे लोगों के सवालों को आगे लाकर शुद्ध बहस करते है और अपनी ग़लती मानते है ,अपनी राजनीति को बदलने की कोशिश करते है। अंबेडकरवादियों को इनसे सीखना चाहिए।
डाँ राममनोहर लोहिया अपनी किताब “मार्क्स से आगे अर्थशास्त्र” में ठीक ही लिखते है :- ” किसी एक व्यक्ति के विचारों को राजनीति कर्म का केन्द्र नही बनाना चाहिए। वे विचार सहायता तो करें, परन्तु नियंत्रण नहीं। स्वीकृति और अस्वीकृति, दोनों ही अंधविश्वास के बदलते पहलू है। मेरा विश्वास है कि गांधीवादी अथवा मार्क्सवादी होना मतिहीनता है और गाधीवाद-विरोधी या मार्क्सवाद-विरोधी होना भी उतनी ही बड़ी मूर्खता है। गांधी और मार्क्स दोनों के ही पास अमूल्य ज्ञान भण्डार है, किन्तु तभी ज्ञान प्राप्त हो सकता है, जब विचारों का ढ़ांचा किसी एक युग या व्यक्ति के विचार तक ही सीमित न हो।
आज देश में जय भीम का नारा सर्वोच्च पर है, जो लोग अंबेडकर और अंबेडकरवादी लोगों से तार्किक सवाल करते है तो इसमें ग़लत क्या है। कई अंबेडकरवादी भी सही सवाल करते है जिन्हें आरएसएस का दलाल कहा जाता है।
अंबेडकरवादी लोगों को समझना चाहिए कि ये सवाल आपसी एकता और सही राजनैतिक समझ के लिए सही है। क्योंकि आपसी एकता में हक़ों का टकराव होना लाज़िमी है ,तो ज़ाहिर है टकराव से सवाल उठेंगे ,उन सवालों को आपस में बैठकर सुलझाया जा सकता है। लेकिन ऐसी मानसिकता ठीक नही है कि अंबेडकर और अंबेडकरवादियों पर किसी ने सवाल किया और वो सवाल अंबेडकरवादी सुन भी ना सके तो कही ना कही तुम ग़लती कर रहे हो।
आज़ादी के बाद ,आदिवासी हक़ों का आंदोलन का पीक तो अभी भविष्य के गर्भ में है। इसमें तेज़ी 1990 के बाद आई अब इसमें उसी तरह सवाल उठेंगे जैसे पिछले आंदोलनों में क्रमश हुआ है। तो आदिवासी लोगों को जो लीड कर रहे है, उन सवालों का स्वागत करना चाहिए और सार्थक बहस के साथ दूरगामी निर्णय लेने चाहिए।
राजनीति कुछ निश्चित सिद्धान्तों ,नैतिक नियमों ,मुद्दों(समय के साथ परिवर्तनशील),विचारधारा पर आधारित होती है जो इन सभी में से एक को भी नज़रअंदाज़ करता है, वह पराजित होता है। चाहे वो कितनी बार जीत के जाय। उसका कितना भी नाम हो ,वो कितनी भीड़ इकठ्ठी कर सकता हो। नित रोज़ नायकों की खोज हमें मार देगी।
याद रखना हर बदलाव सामूहिकता से सभंव है,बाकि अख़बारों में कटिंग निकलवा रहे है हम इससे ज्यादा कुछ नही है।
मुझे अंत में विद्रोही जी के मुख से सुने हुए लफ़्ज़ याद आते है –
“मुझे मसीहाई में कोई यक़ीन है ही नही
मैं मानता ही नही की कोई मुझसे बड़ा होगा” ।

फ़ोटो खलीथी का है।

रोमानी विचारोध की प्रखर और आत्मीय अभिव्यक्तिः आधी रात की प्रार्थना | आईदानसिंह भाटी

सतीश छिम्पा राजस्थानी और हिन्दी के चेतना-प्रवणकवि है। इनकी चेतना की नींव रोमानी विचारबोध है। जिस पर समकालीन की प्रखर और आत्मीयकाव्य-ईमारत खड़ी है। अंग्रेजी शब्द ‘रोमेन्टिसिज्म’ हिन्दी तक आते आते छायावाद में रूपान्तरित हो गया लेकिन यहाँ भी इसे स्थूल के विरूद्ध सूक्ष्म का विद्रोह’ ही कहा गया रोमेन्टिक को हिन्दी में रूमानी अथवा रोमानी शन्य से अभिव्यक्त किया गया। रोमानियत में स्त्री-पुरुष सम्बन्धों और सामाजिक रूढ़ियों के प्रति विद्रोह अथवा क्रान्ति की ज्वाला समाहित रहतीं है। सतीश छिम्पा के हिन्दी काव्य-संग्रह ‘आधी रात की प्रार्थना’ की कविताएँ इस विद्रोह और क्रांति – ज्वाला को प्रत्येक कदम पर पुण्ट करती है।
स्त्री-पुरुष प्रेम सम्बन्धों को सतीश छिम्पा ने रूढ़ नैतिकता से निकालकर मानवीय संवेदना के आधुनिकता बोध से प्रकट किया है। प्रसाद ज्ञान की इड़ा को ‘तर्कों के जल से रूपायित करते हैं तो छिम्पा भी किसी पुराने घिसट चुके निम्न का प्रयोग नही करते हैं और अपने भीतर उठ रहे भावों के ज्वालामुखी को उत्सव का नाम देते हैं। उनका प्रेम ‘इस मौजूदा दुनिया का पहला और अंतिम अनछुआ शब्द है ‘जिसे वे अपनी से गालेना चाहते हैं।’ उनके इस रोमेन्टिक प्रेम में ‘लालों के सुन्दर फूल’, ‘बहुत सा प्यार है , फूलों के नीले अहसास है, रंगों से भरा अकेलेपन का संसार’, ‘प्यार रात और एक मुलायम सी लडकी’ है, ‘यादों के रूप में भविष्य की कॉफी पीती बांहों में नीले महकते पर”, ‘लाल अक्षरों से लिया लिखें, प्रेम कहानियों के बीच चुबन के निशान’ है ,“एक धुंधरे से अक्स में हँसती दुबली सी लड़की जेनी है, मौसमी के पर हवाएँ प्यार का संगीत बजाती है,’ , चश्में के पीछे चमकती आंखों में ख्वाबों के बीजों की अंगड़ाईयाँ है, प्रीत के फिरोजी मौसम’ है , प्रेमिल नजरों की धडकनें महबूबा की पलकों को चूम लेना चाहती है?, ‘चेरी के फूल से प्रीत होठ हैं, प्रीत की ‘पछुआ सांसें, है’ सपनों के पिघलते शब्द’ है, रातें भीगी’ याद के आँसूनों से, “खिलता दिन, बारिश और चश्में वाली लड़की” है, ‘पनिराईलाल आंखों वाला लड़का है, ‘बॉयकट वाली लड़किया’ है, फूलों, पेड़, और पर्वतों और नदियों के सपने देखने वाली, एक बदचलन लड़की है , प्रश्नों और लाहदनों के घेरे उलांघती’ प्रीत है.’धरसी-सी दमकती और फलों सी कविता हैकविता’, प्रेम इस धरती का सबसे प्यारा गीत है, जो शब्दहीन है, “जवान मौसमों के रियल दिन है, प्रीत की धार सी प्यासी आँखे,है और है बुद्रो जो खरीदे गये मूल्यों या सड़क छाप नैतिकता से परेखुद के मौलिक अहितकर के साथ’ खड़ा है”
आधी रात की प्रार्थना की ये प्रेम-व्यंजनाएं न केवल रोमानी और मौलिक है वरन प्रेम पर लगी वर्जनाओं को तोड़ती और ध्वस्त करती, सामाजिक रुढियों को ललकारती विद्युत क्रोध सी शब्दावली है, जो कविताओं को ***प्रणव आत्मीय और प्रखर चेतना सम्पन्न बनाती है। कवि सतीश छिपा की भाषा आंवनिकता में पगी धार के थोर सी अलग ही दिखाई पड़ती है। माँ के लिए कविताओं में इसे स्पष्ट देखा जा सकता है। ‘रोटी की चिटक, रोटी की मुळक, सूखा मरू उजाड़ बिना सपनो और उमीदों का ठाँचा जैसी शब्दावली सहेजता कठि लिखता है-
‘माँ आप बिरखा सी बरस गयीं| हरख गयीं इस घर की भीतें आँगन, देहरी और छत, भाप रोटी, पानी, साग और दिनों के पार खट्टी हिम्मत हो बुझती सांसों की आस।
‘कवि सतीश छिम्पा प्रखर वैचारीकता में पगे क्रान्तिधर्मी कवि है जो अपनी कविताओं में दोस्तोएव्सकी, लियोनार्डो, मायकोवस्की, हो ची मीन्ह, गार्सीयो द लोर्का और चे तथा जेनी जैसे नामों से अपनी विचारधारा की जडे़, प्रखर बनाते हैं।’ भेड़िया खतरनाक होता है आदमी के लिए’, भेडिया दुखी नहीं होता आदि कविताएं मुखौटा धारियों का मुखौटा नौचती यथार्थ उजागर करती है-
ये एक काली सच्चाई है कि जीवन का गद्दार जब मानवीय हित की बात करता है तो उसकी अमानवीय आंखों में एक भेड़िया हँसता रहा।
भेड़िया सिर्फ टोह में होता है अवसर के भेड़िया मार देता है आदमी को भेड़िया बनाने के लिए फिर खत्म हो जाता हैं। प्यार, पीडाएं, उल्लास या अवसाद सभी कुख भेड़िया दुखी नही होता।ये सही| जिजीविषा और जीवतता की मौत पर खड़ी है। जैसी काव्य-पंक्तियां लिखने वाले सतीश छिम्पा का कवि बिना रोमानी रोमानी भावबोध के यह खन नहीं लिख सकता। मैं कवि नहीं हूँ जैसी कविताएं इस कृति में कम ही है क्योंकि कति व्यक्तिवादी नहीं, जागती आंखों में कविता लिखता है जिसमें बीमार पड़ चुके लोकतंत्र का जिक्र होता है, क्योंकि सजग आंखें समय की तासीर का हिसाब लिखती है और ये तासीर बड़ी मारक होती है। आप हम और समग्र कविता कवि की प्रखर विचारणा की गवाही देती है-
‘मैकडॉनल्ड्स में बैठ बर्गर खाते आप कर सकते हो – चे ग्वेरा हो ची मिन्ह गार्सीयो द लोर्का पर बहस महंगी सिगरेट के धुएं में उड़ा सकते हो क्रांति की बातें। पर दोस्त हमने चे को जिया है,
लोर्का बसा है हमारे घर प्रतिरोध में।’
कवि आओ शोक मनाएं, हरजंस गाएं कविता कहता है कि ये बुद्धिजीवी, परजीनी और पूंजीवाद के पोषक ‘ युग का महान पलटाब ‘ नहीं करेंगे। युग का महान पलटाव हम असभ्य लोग ही करेंगे-
हम असभ्य लोग, अनपढ़ निम्न जीवन शैली के मगर हर वर्ग से शत्रु से युद्ध की हद तक घृणा से भरे हुए हम असभ्य लोग इस अँधेरे गांव के लोग’
कवि हल की कलम में श्रम की स्याही डालकर प्यार की कविता लिखना चाहता है। वह दुनिया के सभी शरीफ़ों, देवपुरुषों पारलौकिक, आकाशीष्ट आर महान लोगोंक , मूखौटे नोचता है। वह गली में खेलतेनंग – धडंग बच्चों को देखता है। वह मखमली गड़ों में छिपी सपनों की नींद में सोये बालकों को देखता है, तो उसे लगता है कि यर कैसा समाज अवसरवादी, धूर्त, कॉम्पिटिशन में डूबा, दूसरों के कंधों पर रखकर कामयाबी छूता हुआ रोज धर्म, जाति, भाषा के नाम पर कत्ल करवाता, ब्लैकमेलिंग को हथियार बनाता उसकी आँखों के सामने पसरा है। वह सोचता है, सवाल करता है। उसको बैचेनी है। अनिद्रा और कसमसाहट है। कवि जी रहा है खुद के मोलिक के साथ। किताबें कोख है। महान मनुष्य की ‘ करता कविता में कविशब्द स्थापित करता है।”किताबें एतिहासिक कब्रगाह है हिटलर मुसोलिनी, हिरोहितो और बेतिस्ताओं और पिनोशे की। / किताबें कोख है। महान मनुष्यों की मुक्ति की, शब्द की और सामूहिकता सुन्दरता और न्याय की किताबें धर्म की अंधी तासीर को खत्म करके जीवन को स्थापित करती है। कवि सतीश छिम्पा आओ साथी ‘ में आव्हान करते हुए कहते हैं कि आओ झूठ के नवजात हाथों को उखाड़ आएमान के भरम को तोड़ दें। कवि दलालों की रातों की नींद उड़ाते हैं भेड़ियों ,की भी नींद हराम हो जाती है जब कलमें न्याय की स्याही से मुक्ति गावाएं लिखती है। अथवा जब हाथ जुड़ने की बजाय मूट्ठी की शक्ल लेते हैं। कवि का विश्वास है कि मौत की देह पर हरियल जीवन और जीवन की चमकती लो अवश्य जलेगी और अंधेरे को दूर करेगी।
इस कृति की भाषा संवेदनशील, विचारप्रक्ता प्रतीकात्मक और बोधगम्य है। आधुनिक हिन्दी कविता में यह संग्रह प्रीत और सामूहिकता के प्रकाश पुंज के रुप में पाठकों को सदैव याद रहेगा। आधी रात की प्रार्थना की विषयवस्त और क्लारूप कविता की सम्प्रेषणीयता में सहायकसहायक है। क्रांति की इस रोमानी लौ का मेरा सलाम।