क्या लिटिल बुद्धा को कभी भूल पाएंगे | ईश मधु तलवार

देश के महान कथाकार और प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय महासचिव रहे भीष्म साहनी जी का आज (9 अगस्त) जन्म दिन है।
उनके साथ हमारी भी कुछ यादें जुड़ी हैं। एक बार हमने उन्हें अलवर बुलाया था। सर्दियों के दिन थे। शायद 1980 का साल रहा होगा। हम उन्हें रेलवे स्टेशन लेने गए। मुझे आज भी याद है, उन्होंने नीले रंग की जैकेट और जीन्स पहनी हुई थी। जवान-बुजुर्ग लग रहे थे और लालिमा से चेहरा दमक रहा था। वे हाथ में एक बैग ले कर प्लेटफॉर्म पर उतरे। हमने उनका बैग थामना चाहा, लेकिन उन्होंने मना कर दिया। हमने उनसे बहुत आग्रह किया, लेकिन उन्होंने अपना बैग हमें नहीं दिया और खुद उसे उठाए चलते रहे। तब हमने उस युवावस्था में पहली बार जाना कि बड़ा आदमी कैसा होता है ! एकदम सहज और सरल।

फिर उनसे दूसरी मुलाकात भरतपुर में हुई, जहां इप्टा का सम्मेलन था। यह शायद 1984 का साल था। तब मुझे खुशी हुई कि वे मुझे नाम से पहचानने लगे थे। युवाओं से उनका मित्रवत व्यवहार अद्भुत था।

बहरहाल, उन्हें एक और महान कथाकार राजेन्द्र यादव ने कभी जिस तरह याद किया था, उसे देख कर लगता है, क्या सचमुच हम कभी उन्हें भूल पाएंगे? देखिये क्या कहा था उन्होंने-

"पितामह नहीं, भीष्म को मैं पिताजी कहता था। अपनी "मारू" मुस्कान के साथ वह भी कहता- बोल पुत्तर।... मैं अक्सर ही कहता- यार पिताजी तू अपने बड़े भाई (बलराज साहनी) से बड़ा एक्टर है। पिछले साठ-सत्तर सालों से एक सज्जन और भले आदमी की एक्टिंग किए ही चला जा रहा है। बलराज जी तो शूटिंग के बाद अपना मेकअप बदल डालते होंगे, तू सोते हुए भी भले आदमी की तरह ही सोता होगा।...
"सही है कि भीष्म ने भाषा और शिल्प के न बहुत प्रयोग किए और न मनुष्य के अंतरंग निजी अंधेरी सुरंगों की यात्राएं की - फिर भी अगर वह हमारे समय का बड़ा लेखक है तो इसलिए कि वह बहुत मानवीय है। वह लेखक से बड़ा आदमी है, कह सकते हैं कि मार्क्सवाद का परम मानवीय संस्करण है।...हां, वह बूढ़ा अब कभी नहीं आएगा, मगर क्या हम सब के दिलों में बैठे इस लिटिल बुद्धा को कभी निकाल पाएंगे ? शायद एक दर्दभरी याद की तरह हम महसूस करते रहेंगे कि हां, अभी-अभी वह हमारे बीच में था - हवा, पानी और बिजली की तरह, जो अब नहीं है।"
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यह चित्र 1982 का है, जब भीष्म साहनी प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय अधिवेशन में भाग लेने जयपुर आए।

ईश मधु तलवार की फेसबुक वॉल से 9 अगस्त 2021 की पोस्ट

कविताएँ | मृग तृष्णा

  1. उदास लड़की छज्जे पर झुकती
    और नदी उसके दुःख में झुककर उतरती जाती घाटी में
    प्रेमिकाएं तीरथ करने उत्तर की और बढती रहीं
    प्रेमी समंदर होने की लालसा में कूच करते रहे दक्षिण को
    उधर प्रेम के ख़तों पर लोटती रहतीं
    इंतज़ार की बिल्लियाँ
    उलाहनों की परिक्रमा जाती थी दक्षिण तक
    काशी के पश्चिम में सब फूंक फांक कर
    आग सेंकता था मुर्दा कोई
    सिंड्रेला के जूते इन सबके बीच में कहीं गुम हुए
    और ईश्वर प्रेम में पड़ी उस लड़की के
    जूते की माप जाने को
    नंगे पाँव भटकता है गली- गली |
  2. सारा जीवन था कि
    कि जैसे द्वार पर धरे थे दो दिए सांझ के
    और दरवाज़े दुनिया के प्रवेशद्वार
    रौशनी जीवन थी रौशनी मृत्यु भी थी
    आदमी भरता रहता है दोनों के फ़ासले उम्रभर
    जैसे वैंकुवर की चमत्कारी दौड़ का वह धावक हो
    एडिसन का हजारवां प्रयास हो प्रकाश का
    जैसे सिनेमा के पर्दों पर कोई अपुर संसार हो
    मृत्यु जीवन की पीठ पर
    अचानक मारा गया एक धप्पा है
    सत्य यह है कि हम जीवन का दिया संभाले
    मृत्यु के उत्सव की तैयारी में रहते हैं उम्रभर |
  3. धरती वही जिसमें फूटते हों
    तुम्हारी हंसी के बीज
    जिस झरने से बुझती हो मन की प्यास
    आग वही जिससे खेल सको तुम बेख़ौफ़
    ‘मन की हो अपने’कहकर
    जिस नभ पर फूँक मार दी तुमने
    वह श्वास शुद्ध है
    स्त्री देह के तोते पांच
    धरती,अग्नि,वायु,जल,आकाश
  4. लड़के भीतर वाली स्त्री के बाहर झांकने के डर से
    नहीं रोये
    प्रेमिकाएँ पिता सी मजबूत दिखने की जुगत में ठीक हँसली के नीचे
    गला भरती रही आंसुओं से
    माँएं पल्लू में आंसू बांध कमर में कोंचती रहीं
    कि कहीं बच्चा दुःख में खाना न छोड़ दे बीच में
    सुख में रोते तो संघर्षों के महिमामण्डन करते
    दुःख के आँसू सब कुछ बौना कर देते
    और दिन के हिस्से के आँसू रातें कभी न रोईं
    पिताओं को दुनिया बरगद कहती रही
    पर किसी ने न जाना कि वे
    कदम्ब की डाल सा झुक भी सकते हैं
    जिनपर सवार हो हमने किसी
    ग्वाले ईश्वर सा बचपन पाया
    प्रेमिकाएँ बिना पते वाली चिट्ठियाँ
    अपने प्रेमियों को लिख लिखकर
    जीवनभर कुढ़ती रहीं,
    भाई बहन की एक प्यार भरी चिठ्ठी से
    कोई आधे दिन तक बेचैन रहा
    कोई दोस्त रात भर एंग्ज़ाईटी वाले तलुवे मलता रहा था
    उस साल
    वे लड़कियों को मनाने वाले फूल खरीदते रहे
    गूलर के फूल सा उनको रोते हुए किसी ने नहीं देखा
    उनकी नाराज़गी भी बस एक चॉकलेट की कड़वाहट भर से
    मीठी हो सकती थी
    और अगर कोई चाहता तो कह सकता था कि
    लड़कों के हँसने से भी रातरानी खिला करती है अक्सर।
  5. रौशनी को रौशनी क्यों नहीं कहते ?
    अँधेरे में यूँ उतरो
    जैसे इसके सिवाय दुनिया में दूसरा रंग न हो
    सूरज का चढ़ना और डूबना अचरज नहीं है
    परन्तु उसके बाद का आसमान एक बड़ी घटना है
    भीड़ में सबसे ऊँचा सिंहासन
    अहम् की सबसे पहली सीढ़ी हो सकती है
    बच्चे का अपने पैरों पर खड़े होना
    मानव क्षमता का प्रथम परीक्षण है
    बुढ़ापा अनुभवों की उत्कृष्ट अवस्था
    रौशनी को रौशनी कहो
    अँधेरे का शून्य जीवन का सत्य है
    प्रेम के उनमें उतरने से पहले
    प्रेमिकाएं पानी थीं
    उनमें पत्थर फेंकने वाले पानी की आवाज़ पर
    कान धरे रहे
    लेकिन पानी को काटने के स्वप्न?
    पानी की आवाज़ के स्वप्न?
    पानी में झाँकने वाला अपनी सूरत देखता है
    और आवाज़ फेंके गये पत्थर की आती है
    टूटे हुए दिल मौसमी नहीं होते
    टूटी हुई चीज़ को टूटा ही कहो
    हर बात पर कविता करना उतना ही भद्दा है
    जितना जोकर की नाक पर ताली पीटना
    मृत्यु को मृत्यु कहो न
    जिस दिन डाल से टूटा पत्ता
    बिना किसी निशान के जोड़ लेना
    तब कहना कि तुम ईश्वर हो |
मृगतृष्णा | शोधार्थी एवं अध्यापन कार्य से जुड़ाव
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